आर्मेनिया-देखें युद्ध युद्ध में कौन जीता और कैसे?

दुनिया

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नोगोर्नो-काराबाख की जंग (नोगोर्नो-करबाख युद्ध) में 2000 से अधिक जानें जाने के बाद आर्मेनिया और प्रदर्शित अज़रबैजानी विराम (संघर्ष विराम) पर राज़ी हुई। युद्ध विराम की स्थिति बनाने में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (व्लादिमीर पुतिन) की बड़ी भूमिका रही है। अब एक ओर आर्मेनिया ने कहा कि युद्ध विराम की स्थिति स्थायी नहीं है, तो दूसरी तरफ, तुर्की की शह पर लड़ने वाले शख्स अजरबेजान (तुर्की समर्थन अजरबैजान) ने अपनी जीत का दावा कर दिया। कुछ सवाल ज़रूर खड़े हैं कि सच में कौन जीता है? क्या युद्ध या युद्ध की वजह खत्म हो गई और रूस को बीच में लाने से क्या मिला?

छह सप्ताह की भीषण लड़ाई में दोनों पक्षों के सैनिकों सहित नागरिक भी मारे गए। पूरी दुनिया के कई प्रतिद्वंद्वी देशों ने इस लड़ाई के सिलसिले में अपना पक्ष स्पष्ट करने की कवायद भी की। लेकिन, आर्मेनिया और प्रदर्शित अज़रबैजान की लड़ाई के बाद दक्षिण काकेशिया में रूस का प्रभुत्व बढ़ा। कैसे? आईए समझते हैं कि पूरी कहानी क्या और कैसे हो रही है।

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संघर्ष क्षेत्र के नक्शे की तस्वीर (विकिमीडिया कॉमन्स से साभार), जो पिछले दिनों ही अपडेट की गई।

I युद्ध विराम की स्थिति?

यह तो आपको बताया जा रहा है कि नोगोर्नो काराबाख सीमा विवाद में उलझा इलाका है, जिस पर दोनों देश अपना दावा करते रहे हैं और सोवियम यूनियन के स्पष्ट हो जाने के बाद से संघर्ष करते रहे हैं। इसी विवाद को लेकर भड़के हालिया युद्ध की शुरूआत में तटस्थ रहने वाले रूस ने तब बचाव के बीच किया, जब तुर्की ने अज़रबैजान के पीछे अपनी ताकत झोंक दी।

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तुर्की की मदद से जब अज़रबैजान ने जीत का दावा किया, तब आर्मेनिया ने रूस की मदद मांगी। रूस ने साफ कहा कि आर्मेनिया के साथ उसका सिक्योरिटी समझौता है, लेकिन नोगोर्नो काराबाख में लोगों की सुरक्षा उसकी ज़िम्मेदार सूची नहीं है। लेकिन, तुर्की के बढ़ते दखल के बाद रूस ने अपने दबदबे की खातिर दखल दी। एक तरफ, रूस ने आर्मेनिया की तरफ से सैन्य मोर्चे खोले तो दूसरी तरफ, तुर्की के आतंकवादियों के खिलाफ सीरिया में शिकार किए गए।

साफ तौर पर तुर्की के लिए रूस ने एक चेतावनी जाहिर की। दिखाएँ ईरानी की जीत के दावे को खारिज न करते हुए पुतिन ने आर्मेनिया के पूरी तरह से हार जाने की बात नहीं मानी। निर्णायक भूमिका में रूस के कब्जे में दोनों देशों को अंततः युद्ध विराम की बात मानते हैं। अब यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि युद्ध विराम को लेकर रूस क्या चाह रहा था और उसे क्या मिला?

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रूस का दबदबा कितना बढ़ा?
वर्तमान में यह कहना कठिन है। लेकिन, एक तो तुर्की और कुछ पश्चिमी देशों को इस इलाके से खदेड़ने और चेताने में रूस कामयाब रहा। वहीं, रूस इस इलाके में शांति दल भेजना चाहता था, जिसका विरोध आर्मेनिया और दिखा कि अरब दोनों कर रहे थे, लेकिन अब रूस ये भी कर सकेगा। लेकिन, यहां स्थिति थोड़ी मुश्किल हो गई है। रूसी के दबाव के बावजूद तुर्की काटने को तैयार नहीं है। रूस के शांति दल के सामने तुर्की अज़ेरी वर्गों और सीमाओं के सपोर्ट के लिए अपने सैनिक तैनात करवा रहा है।

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नोगोर्नो काराबाख में युद्धविराम के बाद भी सेनाएं तैनात हैं।

इस युद्ध के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि इस इलाके में रूस के दबदबे को चुनौती दी जा सकती है। तुर्की के बर्ताव से साफ है कि रूस के लिए यहां एक संघर्ष कर पाने वाला उसका दुश्मन खड़ा हो गया है। साफ है कि युद्ध विराम भले ही हुआ हो, लेकिन यहां युद्ध खत्म नहीं हुआ है।

युद्ध विराम का क्या मतलब है?
जैसा कि आर्मेनिया दावा कर रहा है कि यह अस्थायी स्थिति है। इससे साफ है कि युद्ध विराम का मतलब युद्ध खत्म होना नहीं है। रूस और तुर्की के बीच जो टेंशन चल रहा है अगर वहाँ और स्पेंडें बढ़ गई तो जल्द ही यहाँ युद्ध फिर से शुरू हो सकता है। नोगोर्नो काराबाख का पूरा इलाका अज़री सीमा में नहीं गया है, बल्कि कुछ ही हिस्से को कब्ज़े में लेकर अज़रबैजान ने अपनी जीत घोषित कर दी है।

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इन परिस्थितियों में आर्मेनिया इस इलाके पर अपना कब्ज़ा वापस चाहता है, जो 1990 के दशक से उसके पास था। हज़रते पीछे हटने को तैयार नहीं है। रूस की स्थिति यह है कि उसकी सेनाएं दिखती हैं अज़रबैजान की सीमा के भीतर भी तैनात हैं। तुर्की की सेनाएं अज़ेरी सेना के सपोर्ट के लिए तैयार हैं। सार यह है कि सभी लोगों की एक दूसरे की तरफ लक्षित लगाए गए हैं, वर्तमान में बंदूकों के सर्कल को दिए गए हैं।



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