चीन की सभी कूटनीतिक चालों पर भारी पड़ रहा भारत का “वैक्सीन मैत्री” अभियान

  • शान्तनु त्रिपाठी- लेखक, स्वतंत्र प्रत्रकार

तुलसी रचित रामचरित मानस के किष्किन्धा कांड में एक प्रसंग है, जिसमें अपने बड़े भाई बालि से प्रताड़ित सुग्रीव भगवान राम को अपनी व्यथा सुनाते हैं। जिस पर भगवान राम बालि को मारने की शपथ लेते हुए कहते हैं ‘निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना।’ जिसका भावार्थ है- अपने पर्वत के समान दुख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए। कोरोना से जारी जंग में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाने के साथ भारत जिस तरह से अपने मित्र राष्ट्रों एवं अन्य देशों को उपहार अथवा अनुदान सहायता के रूप में कोविड-19 रोधी वैक्सीन दे रहा है, उसके मूल में यही भाव नजर आता है। आपदा को अवसर बदलने वाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति वाली भारत सरकार का यह कदम मैत्री का संदेश देने के साथ ही दुनिया के समक्ष आत्मनिर्भर एवं समर्थ भारत का परिचायक बन रहा है और चीन की कूटनीतिक चाल को मात देता नजर आ रहा है।

भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए वैक्सीन मैत्री अभियान के तहत अब तक नौ देशों को उपहार स्वरूप सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा तैयार की गई कोविडशील्ड वैक्सीन की पहली खेप भेजी जा चुकी है। जिसमें बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव, सेशेल्स, मॉरीशस, म्यांमार, बहरीन और श्रीलंका को 55 लाख खुराक दी गई है। इसके साथ ही अफगानिस्तान को 5 लाख खुराक भेजने की तैयारी है। वहीं ब्राजील और मोरक्को को 20-20 लाख खुराक व्यवसायिक अनुबंध के तहत दिया गया है। इसके अलावा सउदी अरब और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी भारत से आधिकारिक तौर पर वैक्सीन की मांग कर चुके हैं। यही नहीं भारत में निर्मित टीकों के नगण्य साइड इफेक्ट के कारण इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है। अब तक 92 देशों ने मेड इन इंडिया वैक्सीन के लिए भारत से संपर्क किया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक महामारी से जारी जंग में भारत दुनिया की मदद करने के साथ ही अपनी घरेलू आवश्यकताओं को भी पूरा कर रहा है। आज भारत विश्व में सबसे ज्यादा टीकाकरण करने वाले देशों में से एक बन गया है। यहां टीकाकरण अभियान की शुरुआत 16 जनवरी से हुई थी, जिसके तहत 26 जनवरी तक यानी 10 दिनों में 20 लाख से ज्यादा लोगों को टीका लगाया जा चुका है।

मित्र राष्ट्रों को तोहफे में वैक्सीन देने के भारत के इस कदम की दुनियाभर में तारीफ हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के चीफ ट्रेड्रोस अधानोम भारत के कायल हो गए हैं और उन्होंने ट्वीट कर लिखा ‘ग्लोबल कोविड-19 रिस्पॉन्स को लगातार समर्थन देने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया। मिलकर काम करने, ज्ञान साझा करने से ही हम इस वायरस को रोक सकते हैं और जिंदगियां बचा सकते हैं।’ वहीं ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो कोरोना के खिलाफ लड़ाई में भारत के योगदान पर अभिभूत नजर आ रहे हैं। उन्होंने संजीवन बूटी लाते हनुमान जी की एक फोटो ट्वीट कर भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद दिया। भारत की दरियादिली की अमेरिका की नवनिर्वाचित जो बाइडेन सरकार भी मुरीद हो गई है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दक्षिण और सेन्ट्रल एशिया ब्यूरो ने एक बयान जारी कर कहा कि भारत का यह कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य के मामले में बेहद प्रशंसनीय है। भारत ने सिद्ध कर दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सच्चा मित्र है।

ऐसा नहीं है कि भारत अभी अपने पड़ोसी एवं अन्य मित्र राष्ट्रों की मदद कर रहा है। कोरोना के प्रारंभिक दौर में भी भारत ने दुनिया की मदद करने का जज्बा दिखाया था। तब उसने 150 से अधिक देशों को कोरोना के उपचार में सहायक हाइड्रोक्लोरोक्विन दवा भेजी थी। इसके साथ ही भारत की तरफ से ‘सार्क कोविड-19 इमरजेंसी फंड’ में 2.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि की आवश्यक दवाएं, चिकित्सा उपभोग्य सामग्री, कोविड सुरक्षा और टेस्टिंग किट तथा अन्य उपकरणों की आपूर्ति भी उपलब्ध कराई गई थी। इसके जरिए भारत ने दक्षिण एशियाई देशों को यह संदेश भी दिया था कि वह हमेशा की तरह “पड़ोसी प्रथम” की नीति पर ही चल रहा है। संकट की इस घड़ी में भारत ने सिर्फ दक्षिण एशियाई देशों का ही सहयोग नहीं किया, बल्कि ‘एक्ट ईस्ट’ की नीतियों के अनुरूप म्यांमार के साथ भी अपने सम्बंधों को उच्च प्राथमिकता पर रखा। आवश्यक दवा के रूप में सामने आई हाइड्रोक्लोरोक्वीन की पर्याप्त मात्रा और ‘रेमडेसिविर’ दवा की 3000 से अधिक शीशियों की आपूर्ति भारत ने म्यांमार को की। ‘रेमडेसिविर’ वही दवा है जो कोरोना वायरस से संक्रमित अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दी गई थी।

भारत न केवल कोविड-19 रोधी वैक्सीन का बड़ा निर्माता है बल्कि यह दुनिया भर में वैक्सीन बनाने में सबसे आगे है। दुनिया में बेची जाने वाली कुल वैक्सीन का 60 फीसदी हिस्सा भारत में तैयार होता है। यही वजह है कि वैश्विक महामारी कोरोना के इस दौर में आज दुनिया की निगाह ‘संकटमोचक’ बनकर उभरे भारत की तरफ है। कोरोना के जनक देश चीन की वैक्सीन साइनोवैक कारगरता के मामले में दोयम दर्जे की है, जिसके कारण कई देश इसे लेने से मना कर चुके हैं। कोरोना के शुरुआती दौर में मास्क डिप्लोमेसी के जरिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को साधने के प्रयास में विफल हुए चीन ने वैक्सीन के जरिए अपनी इमेज सुधारने का प्रयास किया, जो अब बिखरता हुआ नजर आ रहा है। सही मायने में कहा जाए तो भारत की वैक्सीन डिप्लोमेसी कबीर के दोहे ‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए’ से प्रेरित नजर आ रही है’, जो चीन की आंतर्राष्ट्रीय समुदाय को साधने की सभी कूटनीति चालों पर भारी पड़ रहा है। आज कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के वैक्सीन मैत्री अभियान को वैश्विक समुदाय में रेखांकित किया जा रहा है। इससे आधुनिक हथियारों से लैस होने की होड़ रखने वाली दुनिया में भारत की छवि एक सॉफ्ट पॉवर के तौर पर बन रही है। जिसका आने वाले समय में भारत को कूटनीतिक लाभ मिलेगा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कद भी बढ़ेगा, जो मोदी सरकार के नए भारत के निर्माण के लक्ष्य को आसान करेगा।
(शान्तनु त्रिपाठी- लेखक- स्वतंत्र प्रत्रकार हैं)

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