जापान को देश से खदेड़ने वाले कमांडर की बेटी को म्यांमार की सेना ने क्यों 4 साल के लिए जेल भेजा?

दुनिया

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म्यांमार की एक अदालत ने आंग सान सू की को सेना के खिलाफ हिंसा भड़काने और कोविड नियमों के उल्लंघन के मामले में सज़ा सुनाई है। इस सज़ा के बाद आंग सू की देश मे चुनाव नहीं लड़ पाएंगी।

भारत की पूर्वोत्तर की सीमा से सटा एक मुल्क है म्यांमार जिसे एक समय बर्मा के नाम से भी जाना जाता था। जहां 1 फरवरी को हुए सैन्य तख्तापलट ने दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। भारत समेत कई देशों ने इस सैन्य तख्तापलट का विरोध भी किए थे। लेकिन अब म्यांमार से एक और खबर आई कि नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की को चार साल की सज़ा सुनाई गई है। म्यांमार की एक अदालत ने आंग सान सू की को सेना के खिलाफ हिंसा भड़काने और कोविड नियमों के उल्लंघन के मामले में सज़ा सुनाई है। इस सज़ा के बाद आंग सू की देश मे चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। 33 वर्षीय आंग सान सू की जापानियों को खदेड़ने वाले कमांडर आंग सान की सबसे छोटी बेटी हैं। ऐसे में आपको म्यामंर में सैन्य तख्तापलट और उसके बाद सू की को जेल भेजे जाने के वजहों के बारे में बताते हैं। 

आंग सान सू को 4 सला की जेल

 म्यांमार की राजधानी में एक विशेष अदालत ने 6 दिसंबर को देश की अपदस्थ नेता आंग सान सू ची को लोगों को उकसाने और कोरोना वायरस संबंधी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने का दोषी करार देते हुए सोमवार को चार साल कैद की सजा सुनाई। एक कानूनी अधिकारी ने यह जानकारी दी। इस फैसले की दुनियाभर में निंदा हो रही है तथा इसे लोकतंत्र के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि, सजा के फैसले के कुछ घंटे बाद सरकारी टेलीविजन ने खबर दी कि सू ची की सजा क्षमादान के तहत घटाकर दो साल कर दी गई है। इसने संकेत दिया कि उन्हें यह सजा जेल में नहीं, बल्कि वहीं काटनी होगी, जहां उन्हें फिलहाल हिरासत में रखा गया है। 

आंग सान सू पर क्या हैं आरोप

आपको बता दें कि आंग सान सू की के खिलाफ म्यांमार में कई मुकदमें चल रहे हैं। उनपर भ्रष्टाचार, मतदान में धांधली का भी आरोप लगाया गया है। फिलहाल सेना ने उन्हें दो मामलों में दोषी ठहराया है। आंग सान सू की के खिलाफ लगाए गए कई आरोपों के तहत ये पहला मामला है जिसमें उनके लिए सज़ा का ऐलान हुआ है। इसी साल 1 फरवरी को सेना ने उनकी शक्तियों को छीन लिया था जब उनकी पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करने वाली थी। लोगों को भड़काने का ये मामला सू की और उनकी पार्टी के नेताओं को हिरासत में लेने के बाद पार्टी के फेसबुक पेज पर पोस्ट किये गए बयानों से जुड़ा है। कोरोना वायरस से जुड़े नियम उल्लंघन का मामला पिछले साल नवंबर के है जब उन्होंने चुनाव से पहले पार्टी के लिए प्रचार किया था और बाद में उनकी पार्टी ये चुनाव जीत भी गयी थी।

कौन हैं आंग सान सू

सबसे पहले आपको थोड़ा इतिहास में लिए चलते हैं। साल 1937 में ब्रिटिश क्राउन ने बर्मा को अलग देश घोषित कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के साये में जापान ने इस पर कब्जा जमा लिया। जापान ने यहां लोकल फोर्स के लिए नौजवानों की भर्ती की और टुकड़ी का नाम रखा बर्मा इंडिपेंडेंस आर्मी। बीआईए ने आंग सांन को अपना नेता मान लिया। आंग सान ने एक नई पार्टी और नाम रखा एंटी फासिस्ट पीपुल्स फ्रीडम लीग। इस लीग ने ब्रिटेन से हाथ मिलाया और 1945 आते-आते जापान की हालात पतली होने  लगी। आंग सान ने ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर बर्मा को जापान से आजाद कराया। 1947 में आंग सान की हत्या कर दी गई। अपनी बीमार मार को देखने बर्मा आई 33 वर्षीय आंग सान सू की वतन वापस के जरिए सैन्य शासकों को चुनौती दी। साल 1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। 2010 में उन्हें रिहा किया गया। 2015 के नवंबर महीने में सू की पार्टी ने चुनाव जीता। पिछले साल नवंबर में उनकी पार्टी फिर जीती। धांधली बताकर सेना ने तख्तापलट किया। चुनाव नतीजों के बाद से ही लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार और वहां की सेना के बीच मतभेद शुरू हो गया। अब म्यांमार की सत्ता पूरी तरह से सेना के हाथ में आ गई है।



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