वोट का अधिकार जीने का अधिकार, जन सुनवाई में उठी आवाज

नई दिल्ली के त्रिलोकपुरी में आयोजित जन सुनवाई में मंगलवार को मतदाताओं के अधिकार का मुद्दा एक मानवाधिकार के रूप में उठा। ‘वोट अधिकार, जीने का अधिकार’ नाम से हुई इस सुनवाई में आम लोगों ने अपनी बात रखी और बताया कि मतदाता सूची से नाम हटने से उनकी पहचान और हक पर सीधा असर पड़ता है। वक्ताओं का कहना था कि वोट हर भारतीय नागरिक का बुनियादी अधिकार है, और इस अधिकार के बिना गरीब और वंचित वर्ग के लोगों की आवाज लोकतंत्र में कमजोर पड़ जाती है। जन सुनवाई में दावा किया गया कि सिर्फ चार मतदान केंद्रों पर 416 मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए, जिससे यह सवाल उठा कि अगर छोटे स्तर पर इतनी बड़ी गड़बड़ी हो सकती है, तो पूरे देश में इसका पैमाना कितना बड़ा होगा। सुनवाई में मौजूद लोगों ने मांग की कि मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया पारदर्शी हो, किसी भी नागरिक का नाम बिना सूचना और बिना सुनवाई के न हटाया जाए, और हटाए गए नामों की जांच स्वतंत्र तरीके से हो। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि वोट का अधिकार सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि राशन, पेंशन, आवास और अन्य सरकारी योजनाओं से भी जुड़ा है, क्योंकि कई जगह पहचान पत्र और सूची में नाम ही हक की कुंजी बन जाता है। इसीलिए जन सुनवाई में वोट के अधिकार को जीने के अधिकार से जोड़कर देखा गया और इसे बचाने के लिए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की गई।



