शरद पूर्णिमा पर स्नान दान के साथ मनाई जाएगी वाल्मीकि जयंती

भारतीय सनातन संस्कृति में आश्विन मास की शरद पूर्णिमा केवल एक सामान्य धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य, साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। इस वर्ष पच्चीस अक्टूबर की रात्रि शरद पूर्णिमा के अमृतमयी प्रकाश से जगमगाएगी, वहीं सनातन परंपरा में उदया तिथि की सर्वमान्य व्यवस्था के अनुसार पवित्र नदियों में स्नान, महादान और पूर्णिमा व्रत का पारण छब्बीस अक्टूबर को करना अत्यंत मंगलकारी माना जा रहा है। ज्योतिषीय और खगोलीय दोनों दृष्टिकोणों से शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है, क्योंकि इस रात चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी के सबसे निकटतम बिंदु पर होता है। पौराणिक और आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार इस रात चंद्रमा की धवल किरणों से सीधे अमृत तत्व की वर्षा होती है। इस पावन निशा में गाय के शुद्ध दूध, चावल और मेवे से खीर बनाकर उसे पूरी रात खुले आसमान के नीचे महीन जालीदार कपड़े से ढंककर चांदनी में रखने की सदियों पुरानी परंपरा है। ब्रह्ममुहूर्त में इसका सेवन करने से आरोग्य, शारीरिक बल, दीर्घायु और मानसिक शांति की प्राप्ति मानी जाती है। इसी पुण्य तिथि पर सनातन संस्कृति के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का जन्मोत्सव भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, जिन्होंने रामायण की रचना कर मानवता को धर्म, त्याग और कर्तव्य का मार्ग दिखाया था।



