सोलर पंप वरदान या संकट: घटते भूजल की अनदेखी कहानी

किसानों को डीजल से मुक्ति दिलाने वाली प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा योजना (पीएम-कुसुम) अब एक नई बहस छेड़ रही है। जून 2026 तक देश में 11.49 लाख से ज्यादा सोलर सिंचाई पंप लग चुके हैं, जिन पर 34,422 करोड़ रुपये का केंद्रीय खर्च हुआ है। लेकिन जब पंपिंग की लागत शून्य हो जाती है, तो पानी निकालने की कोई सीमा नहीं रहती। राजस्थान के कुछ इलाकों में सोलर पंप अपनाने के बाद भूजल दोहन 16 से 39 फीसदी तक बढ़ गया है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के आकलन के मुताबिक देश में सालाना 247.22 अरब घन मीटर भूजल निकाला जाता है, जिसमें खेती की हिस्सेदारी 87 फीसदी है। पंजाब में दोहन दर 156 फीसदी, राजस्थान में 147 फीसदी और हरियाणा में 137 फीसदी है, यानी जितना पानी भरता है, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। 2026 का मानसून सामान्य से 13 फीसदी कमजोर रहा, जिससे रिचार्ज की उम्मीद और घटी है। देश की 730 आकलन इकाइयां पहले ही अति-दोहित श्रेणी में हैं।
योजना का तीसरा घटक किसानों को अतिरिक्त सौर बिजली ग्रिड को बेचने की छूट देता है, ताकि पानी बचाने का प्रोत्साहन मिले, लेकिन इसका क्रियान्वयन धीमा है। अटल भूजल योजना के तहत सामुदायिक जल-बजट से 229 में से 180 ब्लॉकों में भूजल स्तर सुधरा है, जो बताता है कि समाधान सिर्फ तकनीक में नहीं, प्रबंधन में है। सौर क्रांति को जल-संरक्षण से जोड़ना अब नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।



