दूध से मछली तक: खाने में घुलता माइक्रोप्लास्टिक का खतरा

प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं, खाने की थाली तक पहुंच चुका है। कोलकाता के एक अध्ययन में पैकेटबंद और कच्चे गाय के दूध, दोनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला है, औसतन प्रति लीटर 3 से 30 कण। शोधकर्ताओं के अनुसार पॉलीथीन और पॉलीप्रोपाइलीन के ये कण मुख्यतः खाद्य पैकेजिंग से आते हैं, लेकिन कच्चे दूध में मिलने से पता चलता है कि दूषण फार्म और प्रसंस्करण के स्तर से ही शुरू हो जाता है।
पुणे में एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के शोध में शहर में बिकने वाली मीठे पानी की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। रूपनगर में बोतलबंद पानी की छह बड़ी ब्रांडों की जांच में हर ब्रांड में 808 से 1,888 कण प्रति लीटर मिले। मोहाली के नैनो विज्ञान संस्थान के अध्ययन ने पहली बार दिखाया कि एकल-उपयोग वाली पीईटी बोतलों से बने नैनोप्लास्टिक आंत के लाभकारी बैक्टीरिया लैक्टोबैसिलस रैमनोसस को नुकसान पहुंचाते हैं और लाल रक्त कोशिकाओं की झिल्ली तोड़ देते हैं।
वैज्ञानिक चेताते हैं कि नियमित सेवन से पुरानी सूजन, हार्मोन असंतुलन और आंत को नुकसान का खतरा है, हालांकि दीर्घकालिक असर पर बड़े अध्ययन अभी बाकी हैं। माप की विधियां भी एक जैसी नहीं हैं, इसलिए आंकड़ों की सीधी तुलना भ्रामक हो सकती है। फिर भी संदेश स्पष्ट है: प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, गैर-प्लास्टिक पैकेजिंग और कड़ी निगरानी अब विलासिता नहीं, जरूरत है।



