लोक मंचों पर रामलीला की जीवंत परंपरा आज भी कायम

लोक मंचों पर रामलीला की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी पहले हुआ करती थी। कस्बों और गांवों में कलाकार महीनों पहले से अभ्यास शुरू कर देते हैं, ताकि मंचन के समय हर दृश्य सजीव लगे। राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जैसे पात्रों की वेशभूषा और संवाद दर्शकों को कहानी से जोड़ देते हैं। बच्चे मंच के सामने बैठकर पूरी रुचि से लीला देखते हैं और उनसे जीवन मूल्यों की सीख भी लेते हैं। आयोजकों का कहना है कि रामलीला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सत्य, त्याग और मर्यादा का संदेश भी देती है। कई स्थानों पर स्थानीय युवाओं को अभिनय का अवसर दिया जाता है, जिससे नई प्रतिभाएं सामने आती हैं। मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था और संगीत की तैयारियों में पूरा मोहल्ला सहयोग करता है। महिलाएं भी पात्रों की वेशभूषा तैयार करने और प्रसाद बनाने में योगदान देती हैं। दर्शकों की भीड़ यह बताती है कि आधुनिक साधनों के बीच भी लोक रंगमंच की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। आयोजक चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी इस परंपरा को संभाले, ताकि लोक कला का यह रूप लंबे समय तक जीवित रहे।



